ज्योतिरादित्य आज के दौर का जयचंद?

इस रंग बदलती दुनिया मे इंसान की नियत ठीक नहीं

पुराने समय का ये गीत आज जेहन मे गूंज रहा है। साथ ही याद आ रहा है इतिहास भारत का, चाहे मुगल हो या अंग्रेज़ सभी भारत पर शासन इसीलिए कर पाये की घर मे की कोई गद्दार छुपा बैठा था जो की सत्ता या धन के लालच मे अपनों की सत्ता पलटने के लिए विदेशी आक्रांताओं से हाथ मिला बैठा था।

फिर याद आता है 52 वर्ष पूर्व 1967 का इतिहास जब ग्वालियर राजघराने की विजयराजे सिंधिया ने अपनी पार्टी छोड़ मध्य प्रदेश मे काँग्रेस की सरकार गिराई थी।

कहते है इतिहास अपने आप को दोहराता है, हाल ही मे विजयराजे सिंधिया के पौत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी अपनी पार्टी को धोखा देते हुए, अपने आदर्शों को ताक पर रख कर न केवल प्रदेश मे काँग्रेस की सरकार गिराई बल्कि भारतीय जनता पार्टी मे शामिल भी हुए। कहा जाता है की काँग्रेस मे उनकी अनदेखी से आहात हो कर उन्होने काँग्रेस छोड़ दी।

चलिये चलते है ज्योतिरादित्य के राजनीतिक सफर के साथ। 30 सितम्बर 2001 मे पिता स्वर्गीय महाराज माधवराव सिंधिया की असामयिक मृत्यु के पश्चात काँग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर 24 फरवरी 2002 को ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना से सांसद बने, तब से ले कर मई 2019 मे जब तक ये चुनाव नहीं हारे, तक ये गुना से सांसद रहे। 2007 से 2014 तक ज्योतिरादित्य काँग्रेस सरकार मे केंद्रीय मंत्री रहे, 2014 मे काँग्रेस सरकार जाने के पश्चात ज्योतिरादित्य सिंधिया काँग्रेस पार्टी के लोकसभा मे मुख्य सचेतक रहे, साथ ही तत्कालीन काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की कोर टीम के सदस्य, काँग्रेस वर्किंग कमिटी के सदस्य भी रहे। यही नहीं, 2013 मे मप्र चुनाव मे इन्हे चुनाव समिति का अध्यक्ष बना कर मप्र चुनाव की ज़िम्मेदारी भी दी गयी। काँग्रेस ने इन्हे राष्ट्रीय महासचिव बना कर, आधे उत्तर प्रदेश की ज़िम्मेदारी दी, जो की प्रियंका गांधी वाड्रा के समान पद और ज़िम्मेदारी थी। 2019 के विधानसभा चुनाव मे काँग्रेस ने इनके पसंद के 50 से अधिक उम्मीदवारों को टिकिट दिया और जीतने पर 9 मंत्री बनाए।

तो इनके सफरनामे पर नजर डालने पर यह तो स्पष्ट है की ज्योतिरादित्य का काँग्रेस मे कोई तिरस्कार नहीं हुआ, उल्टा उन्हें इनकी काबलियत से कहीं ज्यादा दिया गया। कॉंग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने भारत के किसी भी काँग्रेस नेता से अधिक इनपर विश्वास जताया।

एक खबर ये भी आई की 5 माह से राहुल गांधी ने इन्हे मिलने का समय नहीं दिया, जबकि राहुल गांधी के अनुसार ज्योतिरादित्य उनके स्कूल के जमाने के मित्र है और ये एक मात्र नेता है जो बिना एप्पोइंटमेंट के राहुल गांधी से मिलने आते रहे है। राहुल गांधी और ज्योतिरादित्य की मित्रता ऐसी घनी थी की, ज्योतिरादित्य राहुल गांधी की प्लेट से खाने के अलाव उनके जैसे कपड़े भी पहनते थे, मगर कहा जाता है ना की समान कपड़े पहनने से समान सोच नहीं होती, वही साबित हुआ है।

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गांधी परिवार और ज्योतिरादित्य के बीच के संबंध कोई नए नहीं, और कोई साधारण नहीं, स्वर्गीय इन्दिरा जी के भी स्नेह के पात्र थे ज्योतिरादित्य।

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जिस सोनिया गांधी ने स्वर्गीय माधवराव सिंधिया की मृत्यु के पश्चात ज्योतिरादित्य को ममता दी, जिस राहुल गांधी ने ज्योतिरादित्य को भाई जैसा स्नेह दिया, ज्योतिरादित्य ने महज, क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया ने महज सत्ता के लोभ मे उनकी पीठ मे छुरा भोंका? क्या सत्ता के लालच मे सिंधिया ने थाली मे खाना उसी मे छेद किया?ScindiaInhductionToCongress.jpeg

आखिर इस राजनीतिक उठापटक से किसे क्या मिला? किसे यश और किसे अपयश मिला? किसका फायदा और किसका नुकसान?

पहले बात करते है काँग्रेस की, ये सत्य है की काँग्रेस का अल्पावधि मे नुकसान हुआ है, मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य से सत्ता चली गयी। मगर इस बात को नजरंदाज करना गलत होगा की मध्य प्रदेश काँग्रेस मे फैली गुटबाजी का एक हिस्सा खत्म हुआ। जो मध्य प्रदेश काँग्रेस की राजनीति से जुड़े हुए है, वो जानते है ज्योतिरादित्य ने मध्य प्रदेश मे अपनी समानान्तर काँग्रेस चला रखी थी। कोई भी ज्योतिरादित्य के खिलाफ कुछ बोल या लिख दे तो उनके समर्थक मर्यादा की सभी सीमाएं लांघ जाते थे, चाहे वरिष्ठतम नेता हो या आम कार्यकर्ता, ज्योतिरादित्य के लोगो का कहर उनपर टूटता ही था। अनेक ऐसे कोंग्रेसी है जिनहोने ज्योतिरादित्य गुट के काँग्रेस से बाहर जाने पर राहत की सांस ली, और एकजुट हो कर अगले चुनाव की तैयारी मे जुट जाने की ठान ली है।

अब बात करते है वर्तमान मे कार्यकारी मुख्यमंत्री कमलनाथ जी की और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की। इस पूरे प्रकरण मे उनकी सत्ता अवश्य गयी है मगर उनकी छवि जनता मे ऐसे नेता के रूप मे उभरी है जो सिद्धांतों से सम्झौता नहीं करता। जिसने अल्पमत मे आने पर त्यागपत्र दे कर राजनीति मे स्वच्छता को बरकरार रखा। आज पूरे प्रदेश की काँग्रेस उनके पीछे लामबंद है। कमलनाथ कॉंग्रेस के निर्विवाद सशक्त नेता के रूप मे उभरे है।

इस प्रकरण के अगले खिलाड़ी राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री दिगीविजय सिंह की बात ना करें तो पूरा प्रकरण अधूरा ही रह जाएगा। ज्योतिरादित्य समर्थको का दावा है की ज्योतिरादित्य ने काँग्रेस दिगीविजय सिंह की वजह से छोड़ी। काँग्रेस मे दिगीविजय सिंह और ज्योतिरादित्य के बीच की प्रतिस्पर्धा कोई आज की बात नहीं है, दिगीविजय सिंह ने पूर्व मे भी स्वर्गीय महाराज माधवराव सिंधिया को मुख्यमंत्री न बनने दे कर स्वयं मुख्यमंत्री बने थे। मगर, वर्तमान की स्थिति अलग है। दिग्विजय सिंह को काँग्रेस ने ना काँग्रेस वर्किंग कमिटी मे जगह दी, ना ही काँग्रेस मे कोई पद मिला। जो की ज्योतिरादित्य को मिला, यदि आरोप यह है की ज्योतिरादित्य की दिग्विजय सिंह ने चलने न दी तो, इसको मैं इस प्रकार से देखता हूँ की पद विहीन दिग्विजय सिंह के समक्ष ज्योतिरादित्य कमजोर साबित हुए, दिगीविजय सिंह की राजनीति सफल रही, उन्होने अपने राह का कांटा निकाल फेंका।

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अब बात करते है ज्योतिरादित्य की, काँग्रेस ने ज्योतिरादित्य के 9 विधायकों को मंत्री बनाया, हारे हुए उम्मीदवार को शासकीय योजनाओं के उदघाटन का अधिकार किया, हमेशा हर जगह स्टार प्रचारक बनाए रखा, तमाम अधिकारियों को शान से मीटिंग के लिए बुलाते थे बिना किसी अधिकार के। नरेंद्र तोमर, प्रभात झा, शिवराज चौहान, कैलाश विजयवर्गीय जैसे लोग क्या ज्योतिरादित्य की चलने देंगे? बिना किसी पद या शासकीय ज़िम्मेदारी के जिस प्रकार ज्योतिरादित्य शासकीय योजनाओं का उदघाटन करते थे, क्या अब संभव होगा? क्या भाजपा सरकार मे ज्योतिरादित्य कलेक्टर सहित अधिकारियों की मीटिंग बुला सकेंगे? और ये तो सर्वविदित है की भाजपा मे नरेंद्र मोदी और अमित शाह के अलावा किसी तीसरे की नहीं चलती, यहाँ तक की मध्य प्रदेश मे भी ज्योतिरादित्य भाजपा के पहली पंक्ति के नेता नहीं बंद सकते, इनका नाम शिवराज, तोमर, झा, विजयवर्गीय जैसे अनेक नेताओं के बाद ही आएगा। सभी बातों पर ध्यान देने पर ये तो स्पष्ट है की ज्योतिरादित्य ने मान सम्मान के लिए काँग्रेस छोड़ भाजपा का झण्डा नहीं थामा, कारण कुछ और है। क्या ये कारण यस बैंक से जुड़ा है या ये कारण 40 हजार करोड़ रुपये के स्ंपात्ति घोटाले से जुड़ा है, ये कभी तो सामने आ ही जाएगा।

अब बात करते है काँग्रेस से बागी हुए उन 22 विधायकों की, जिनमें से 6 मंत्री भी थे, जो काँग्रेस को छोड़ भाजपा के साथ गए। करोना जैसी महामारी के समय ये मंत्री बंगलोर के किसी रिज़ॉर्ट मे मस्ती छान रहे थे। हो सकता है इनको इस बार भाजपा से उम्मीदवार भी बना दिया जाये, मगर इन 22 मे से कितने जीत कर आएंगे? कुछ तो 3000 से भी कम वोटो से जीत हुए है, और एक तो मात्र 350 वोटो से। जनता ने देखा है इनको बिकते हुए, जनता ने देखा है इनके धोखे को, जनता ने देखा है किस प्रकार ये अपने कर्तव्य से विमुख हो गुलामी कर रहे थे। जनता ने देखा किस प्रकार इनकी सुरक्षा मे लगे गुंडों ने एक विधायक के पिता से बदसलूकी की और ये देखते रहे। क्या ये सब देखने के बाद जनता इनपर विश्वास करेगी? क्या कल तक कोंग्रेसी तिरंगा डाले इन नेताओं को भाजपाई भगवा पट्टे के साथ जनता स्वीकार करेगी?

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और भाजपा को क्या मिला? सत्ता मिली मप्र की मगर इज्जत गवाई, प्रदेश की जनता मे ये बात घर कर गयी है की भाजपा ने ज्योतिरादित्य को खरीद कर सरकार गिराई है। प्रदेश की जनता की सहानुभूति कमलनाथ जी के साथ है। और साथ ही मिला है एक घमंडी, नकचढ़ा पूर्व राजघराने का वारिस जो आज भी खुद को महाराज समझता है और बाकी सभी को गुलाम। अब प्रदेश मे भाजपा के पहले ही आधा दर्जन मुख्यमंत्री बाद के दावेदार थे और अब एक और भाजपा मे। अल्पावधि मे भाजपा को लाभ अवश्य हुआ है मगर दीर्घकाल मे ये ज्योतिरादित्य भाजपा के गले की फांस बन कर उभरेंगे।

इस पूरे विवाद मे हारा कौन? काँग्रेस का कार्यकर्ता हारा, जिसने दशकों सिंधिया के पीछे झंडे थाम उनका साथ दिया, जिसने स्वर्गीय माधवराव सिंधिया की मृत्यु के पश्चात ज्योतिरादित्य को उनका उत्तराधिकारी समझा, जिसने सिंधिया की काँग्रेस के प्रति वफादारी को एक छलवा पाया, जिसने सिंधिया के आदर्शों को एक ढकोसला साबित होते देखा। जो आज भी असमंजस मे है की सिंधिया के साथ तो चला जाए मगर दशको जिसे गांधी का हत्यारा और सांप्रदायिक बताया उस भाजपा के साथ कैसे जाये। जिस शिवराज चौहान, नरेंद्र तोमर और कैलाश विजयवर्गीय जैसे से वर्षो तक अपने महाराज के लिए लड़ते रहे, उन्हे अपना नेता कैसे मानें, कैसे नरेंद्र मोदी अमित शाह ज़िंदाबाद के नारे लगाए। सिंधिया के साथ जाएँ तो कोंग्रेसी गद्दार बोले और अगर सिंधिया के साथ ना जाये तो सिंधिया वाले गद्दार बोलेंगे। सिंधिया को तो राज्यसभा सीट मिल गयी, धनधान्य से भरपूर सिंधिया को और धन मिल गया, केंद्रीय मंत्री भी बन ही जाएँगे, मगर उनके कार्यकर्ताओं को सिवाय असमंजस और अपमान के क्या मिला?

पद और सत्ता आती जाती रहती है, अगर मान बड़ी मुश्किल से कमाया जाता है, जो कोंग्रेसी ज्योतिरादित्य को महाराज महाराज कहते नहीं थकते थे, वो आज उन्हे गद्दार, जयचंद, गिरगिट, B&D पुकार रहे है, जनता मे ये कहा जा रहा है की ज्योतिरादित्य ने स्वर्गीय महाराज माधवराव सिंधिया का अपमान किया, अपने समर्थको का अपमान किया, थोड़े लाभ के लिए अपनी इज्जत बेच दी। और भाजपा मे तो उन्हे विभीषण की संज्ञा दे ही दी है, जो ज्योतिरादित्य कल तक काँग्रेस के सर का ताज था, वो आज क्या होगा ये कैलाश विजयवर्गीय कुछ वर्ष पहले बता ही चुके है।

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ज्योतिरादित्य की इस हरकत पर एक ही शेर याद आता है।

ये बंद कराने आये थे तवायफो के कोठे
मगर सिक्को की खनक देखकर खुद ही नाच बैठे

2 comments

  1. मनोज शुक्ला's avatar

    आपने सिंधिया और एमपी में कांग्रेस की वर्तमान राजनीति का निचोड़ पेश किया है आपकी लेखनी प्रभावित करने वाले
    ज्योतिराज सिंधिया को गद्दारी नहीं करनी चाहिए ज्योतिरादित्य को तो बीजेपी में एक बड़ा पद मिल सकता है लेकिन उनके साथ जुड़े हुए कार्यकर्ताओं की राजनीति पर संकट गहरा जाएगा और निश्चित ही उनके राजनीतिक भविष्य अंधकार में पहुंचने के करीब है

    मेरा व्यक्तिगत मानना है की नींद तो सिंधिया को भी नहीं आ रही होगी अपनी गद्दारी पर

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    1. Manish Sirsiwal's avatar

      बहुत धन्यवाद आपकी प्रतिकृया के लिए। इससे ही मेरा हौसला बुलंद होता है।

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